Saturday, 23 July 2016

कश्मीर

हा मे २ बार कश्मीर हो आया हु , गुरुर इसी बात का है , जिंदा लौट के आया हु काफी बदल कर !

पहली बार रेल से गया तो २ दिन लगे थे झेलम में अहमदनगर से जम्मू तक और दूसरी बार बस २ घंटे लगे थे हवाई जहाज में , पुणे से दिल्ली १ घंटा और दिल्ली से श्रीनगर एक घंटा। 
पहली बार गए थे रेल से तब , कटरा  उतरे थे सुबह के वक्त , माँ वैष्ण्व देवी का पहाड़ दिखा , अच्छा लगा था।  दिनभर फिर खाना खाने के बाद मोहल्लो से जब रपट चल रही थी बाजार में  तोह कही से भी माता के पहाड़ के साथ आँखमिचोली हुआ करती थी। 
रात को निकले फिर हम दर्शन करने uमाता के ख़च्चर पर, ऊपर से शहर का नजारा काफी न्यारा था , जैसे सोने चांदी टुकड़े गिरे हो लॉन पर और स्ट्रीट लाइट के रौशनी में वे चमक रहे थे , पूरा शहर जैसे सोना चांदी से बना चमक रहा था !
दर्शन अच्छे हुए के , दूसरी बार आया तो कटरा में गया ही नहीं ! माता का बुलावा न  था !
तो जब दूसरी बार गया था हवाई जहाज से ,
झुकी नजरो से , बादल देख रहा था 
और होटो पे एक मुस्कान थी 
हसी तोह तब फूटी  मेरी चौंक कर 
जब पापा ने कहा बादल नहीं है वो बर्फ है बर्फ !
ऐसा था मेरा प्लेन और बर्फ से जिंदगी में पहिली बार रूबरू होने का तजुर्बा ! श्रीनगर में बादल , बारिश , बर्फ , कोहरा , ठंड सब ने एकसाथ स्वागत किया था और आखिर तक साथ नहीं छोड़ा हमारा। जो पहली यात्रा में नहीं था !

सबसे हैरतअंगेज चीज वो थी की हमारी गाड़ी के ड्राइवर का नाम गुलज़ार था , हमारा सफर भी वहीं पे गुलजार हो गया !

हाऊस बोट में न रहकर हमने होटल में ही रहना पसंद किया , दोनों वक्त ! पिछली बार में , माँ  ,पापा तीनों ही आए  थे , इसबार कलवाणी , जोशी और तीन , सब मिलकर ९ थे !

टुरिष्ट जो देखते है वो हमने पिछली बार भी देखा था , पर इस बार बर्फ हमारा पीछे पीछे अनोखा कश्मीर दिखा रही थी ! रुई के गोडाऊन से सफर चल रहा था हमारा , पुरे शहर से। 

चेश्मशाही देखी , जो पहले  झरना  हुआ  करता था , अब एक गार्डन है , वहाँ  का पानी सबसे शुद्ध और मीठा माना जाता है !
मुग़ल गार्डन,शालीमार गार्डन जो दल सरोवर के किनारे बसे है। वहाँसे हाऊस बोट्स और शिकारो का नजारा काफी लुभाता है !
परिमहल देखा , ट्यूलिप  देखा , और एक झील है थोड़ा दूर  है श्रीनगर से , ‘जन्नत का टुकड़ा' केहेते है उसे, वो भी देखा ! सब में काफी अलगपन था , समानता  थी तो वो की ’मिकी माउस ' का मुखड़ा याद है ? उस तरह दिखने वाले काफी रंगो के फुल थे वहाँ , कुछ लुभाते थे कुछ डराते थे ! शालीमार गार्डन की तस्वीर , 
भारत के १० रुपये के नोट पर भी छपी हुई है , इतना वो मश्हूर है !
खीर माता के दर्शन किये , हजरतबल दर्गा  पर सजदा भी किया । श्रीनगर तोह इतना घुमा गुलज़ारजी के साथ , मुर्गे - बकरे - कबाब - बीफ - गोस्त  सब चखे .. रास्ते वाले और मेहेंगे भी , अच्छे थे ! केसर , शॉल , स्कार्फ , जैकेट , एपल्स , बैट के दुकान , कारखाने , खेत , खलियान  देखे , कही कही गुलज़ार जी हमने कुछ खरीदना ही चाहिए कह कर अड़ जाते थे , खुदके साथ अपनों के भी पेट भर ते थे !

श्रीनगर में लाल चौक से निकलकर भी घूम आता ,औरते काला बुरखा पहने थी ,  कश्मीर भी कुछ ऐसाही लगा मुझे , जैसे सफ़ेद बर्फ का बुरखा पेहेने हो ! भारतीय सैनिक हर तरफ बंदूक धरे खड़े थे , नुकीली नजरो से सबको  देखते ,  कही बम न फूटे , कही दंगले न भड़के , जैसे पूरा शहर अंदर से झुलस रहा है पर चेहरा से ढका है !

सोनमर्ग - गुलमर्ग में गया तो , सब पहचान का लग रहा था ,  देखा था और कई बार फिल्मो  दिखा था !
गरम चॉकलेट पे ठंडा व्हॅनिला डाला हो तो जो दिखेगा , वैसेही कुछ , सारे बर्फीले पहाड़ नजर आ रहे थे ! वहाँ के लोग भी वैसे  दीखते है , बिना बटन वाला शर्ट पहने देखो कभी  किसीको !

चिनार के झाड़ तो , ढलान पर से  धीरे धीरे उतरने वाले गड़रिये लगते थे ! 
पहाड़ी लोग खुदको हिंदुस्तानी नहीं समझते, स्कीइंग करना सीखते वक्त , ‘तुम हिंदुस्तानी बहुत डरपोक हो ’ ऐसा कश्मीरी लहेजे में चिढाते है सभी को ! तब पता चलता है , कश्मीर हमेशा सुर्खियों मे क्यों रहता है !
पहाड़ों पर भारी बर्फ़बारी में , कही दूर एक हरा पत्ता दीखता था , बादमे पता चला , वो हरा पत्ता , भारतीय सैनिक है , जो हराभरा कश्मीर ,‘ हरे ’ पाकिस्तान से दूर रख रहा है !
बीचमे ही एक दिन सुरज निकला था , तब हम गुलमर्ग में थे , पर सारा कश्मीर पिघल रहा था उसदिन , छप्परों पर जमा हुआ बर्फ थप्प से गिरता था , जैसे कोई बच्चा बर्फ के गोले बनाकर फेक रहा  है , कभी निशाना लगता था , कभी कोई बच जाता ! 
बर्फ में खेले हम सब , तस्वीरें पता नहीं , PC में किस फोल्डर में रखे थे भूल गया हु , शायद वो बर्फीली तस्वीरे  जम गयी होगी अबतक !
कभी यादो का सूरज निकलता है मन में तो काम से पिघल कर , कश्मीर मे बेह जाता हु , पहाड़ों पर चढ़ कर, मुह खोल कर ताजा ताजा बर्फ खाने लगता हु !


Saturday, 9 July 2016

बच्चे आजकल बूढ़े पैदा होते है

बच्चे आजकल बूढ़े पैदा होते है 
टूटे हुए दाँत , दूसरों पर मदार 
झुकी गर्दने , धिमिसि चाल ... 
आखों पर चष्मा ,
किताब स्कुल की पढ़ते वक्त
आजकल , खेलना ठुकराते है 

पीठ पर बोजा होता है भारी 
सपनें कुछ अपने  
कुछ अपनो के
अौर काफी जिम्मेदारी ... 
उसमे होती है समाई ... 

मैदान पर बूढ़े ही दौड़ते नजर आते है अब ... 
खेलते है , हस्ते है जोरो से 
निम का पेड़ स्टंप बनता है... 
जब बुढे क्रिकेट खेलते है !
वही निम के निचे 
जो कभी ताश खेलते वक्त 
छाव बना करता था उनके ख़ातिर ... 
जो आते है कुछ चुनिंदा बच्चे 
मैदान पर ,
बस जितने के लिए आते है 
लड़कर एकदूसरोंसे 
काफी कुछ हार जाते है 

बचपन और बुढ़ापा 
एकसा होता है सुना था ... 
पर आजकल 
बच्चे बूढ़े पैदा होते है 
और बूढ़े काफी बच्चे बन गए है ... 


P.S. - 
Javalpas 2 varsha hi kavita manat trass det hoti ... ajun purnatvala nahi ali ... karan mich samadhani nahiye ... tumhala hyavar kahi bolaycha aslyas ... salla deyche aslyas .... jarur dya ! Happy reading 


Friday, 1 July 2016

पहिलं प्रेम ...

अहो टायर नवीन घेता येतं
पण ह्या हृदयाचं काय ?

माझ्या , रोहित लाड आणि अभिजित चव्हाण च्या गाड्यांची चाकं कुठेही आणि कधीही पंक्चर हाऊ शकतात ... त्याच बरोबर पंक्चर होतात ते आमचे हृदयं ...  आम्हाला कुठेही आंणि कधीही प्रेम होतं ... आणि मग मला प्रेमात पडलेला हृदय हे पंक्चर झालेल्या टायर प्रमाणेच वाटतं ...

मला माझ्या कडे सायकल असताना तिच्या चाकाला झालेलं पहिलं पंक्चर आठवतं आहे आणि त्याच बरोबर ... पाहिलं प्रेम देखील आठवतं ... त्यानंतर माझ्या वाहनांनी आणि नशिबाने पंक्चर वाल्यांशी अजूनही इमान राखून ठेवला आहे ...

तुम्ही हृदयातुन एक तीर  जातोय असं चिन्हं पहिलं असेल ... ते खरं तर 'पंक्चर' च प्रतीक आहे ... "नाहीत्या गोष्टी नाही तिथे घुसल्या की आयुष्य  पंक्चरच होतं" ... हेच ते सांगत आहे .

रस्त्याने जाताना पंक्चर होतातच ... ते काढून देणारे पण भरपूर असतात . एखाद्या ने प्रेमात नकार दिला तर आयुष्यात पंक्चर झालेलं हृदय घेऊन जाताना ... कोणीतरी आपलं प्रेम स्वीकारुन ... त्याचंही पंक्चर काढून मिळतं . टायर ला पॅच आणि प्रेमातलं पॅच अप ... ही जुन्या गोष्टीला ठिगळं लावुन वापराची  तकलादू गोष्ट आहे . टायर मध्ये हवा भरावी तशी ... चौका चौकात हृदयाची हवा सुंदर व्यक्ती कडे पाहिलं की आपोआप भरते ...
ट्युब लेस टायर प्रमाणे फिलिंग्स लेस हृदय आले आहेत ... त्यांचं पंक्चर पटकन निघतं त्यात पॅच आणि पॅच अप दोन्हीही लागत नाही .

तर अजूनही मला , वाहनाला झालेलं पहिलं पंक्चर आठवत आहे ... त्याला काढून देणारे भरपूर मिळाले ... पण पहिल्या प्रेमाचं हृदयाला झालेलं पंक्चर ... 'काढून देणारं' मी शोधत आहे ... तो पर्यंत त्यात हवा भरत आहे ... आणि जिंदगी च्या प्रवासात एकटाच पुढे चाललो आहे .

पंक्चर आणि प्रेम ह्या  महागड्या , वेळखाऊ आणि विचित्र गोष्टी कोणापासून सुटत नाहीत

अहो टायर नवीन घेता येतं
पण ह्या हृदयाचं काय ? 

गंध

प्रत्येकाच्या काही आवडी निवडी असतात, त्या आवडी निवडींना कोणताच पर्याय उरत नाही तेव्हा ते 'हट्ट' होऊन बसतात. जी गोष्ट माणसाला एकत्र आ...