Saturday, 30 April 2016

जिंदगी एक तोहफा

जिंदगी एक तोहफा

" कुछ मेहेंगे तोहफे कभी कभी बाप से विरासत में मिलते है और कभी कभी कुछ सस्ते तोहफे , जैसे कपडा, घड़िया , साड़िया अपनों में ही घुमते रहते है "

लड़का हो या लड़की , बच्चा हो या बुढ़ा , शहंशाह हो या सिपाही , आशिक हो या अकेला कोई , सभी को एक चीज अच्छी लगती लगती है।वो चीज कौनसी है पता है ?  वो चीज है तोहफा !

तोहफा, ये  कुछ ऐसा होता है की , नफ़्रतो की दरारों को दूर भगाता है उन्हें  नजदीक लाकर , नही तो दो दिलो के बिच से पुरा समंदर बहा देता है। इसलिये मैने सबको दुनिया का सबसे अमुल्य तोहफा देना चाहता हु , पैसे ? नहीं नहीं पैसा तो कितना भी दे दो, कम ही होता है ! जरुरतमंद चीजे ? दे दे कर थक जाऊंगा , माँगने वाला एक वक्त शर्मा जाये।
अगर  देना ही हो तो वक्त दे दो , वो भी जरुरत के समय पर , उसकी किम्मत पैसो से ज्यादा होती है। ऐसे मुझे लगता है !मगर मैंने या किसी और ने तुम्हे वक्त देने से भी अच्छा तोहफा पता है क्या है ? तुमने खुदको इस व्यस्त जीवन में थोड़ा वक्त देना चाहिये !

मे तो किताबे देना पसंद करता हु , साथ मे कुछ तस्वीरें , जिनसे पुरानी यादें ताज़ा हो। नहीतो सबसे सस्ता , मजबुत और टिकाऊ तोहफा दे देता हु , शुभकामनाओं का।

वैसे तो जिंदगी का सबसे बड़ा तोहफा खुद ये जिंदगी है ,ये वक्त , ये पल , ये सब , जो जो जी रहे है हम , सब ये एक तोहफा ही तो है और जो मिल रहा जिंदगी में  औरों से तोहफे में लिपटा और कोई तोहफा है। जिंदगी के तोहफे में चाहिए कुछ और , पर मिलता कुछ और है , पर आगे बढ़ते जाना है।

मुझे तोहफे देना और लेना दोनो अच्छे लगते है , उससे हेसियत पता चलती है , अपनी भी और सामने वाले की भी। तब लगता है , बोहोत कुछ मिलता है , सभी से मिलता है , अनेक रूपों में मिलता और सब बहुमूल्य होता है , तब लगता है " कुछ मेहेंगे तोहफे कभी कभी बाप से विरासत में मिलते है और कभी कभी कुछ सस्ते तोहफे जैसे कपडा, घड़िया , साड़िया अपनों में ही घुमते रहते है "


Sunday, 24 April 2016

Love Story

तीसरी मंजिल पर रहनेवाले अमीरों के केक्टस (cactus) को सामनेवाली झोपड़ी के बाहर रेहने वाली तुलसी से प्यार हो गया था।
खिड़की में बसा कैक्टस झुकी नजरो से उसे दिन रात ताड़ता था। ... नन्हीसी मुस्कान देकर... उससे बात करना चाहता था। तुलसी भी सूरज , बादल , चाँद को ... देखने के बहानेसे तिरछी नजरो से अंगड़ाई देते वक्त कैक्टस को देख लेती थी ... शरमाकर मुंह फेर लेती थी। ... क्युकी वो हर वक्त उसे ही देखता था।
सुरज की पहेली किरण , बारिश की पहेली बून्द , खुली साफ़ हवाए , शहर की बदलती तस्वीरो  ...  पर जैसे कैक्टस का अधिकार था  ... ऐसे तुलसी सोचती थी ... क्युकी वो आमिर था।
कैक्टस का मानना था ..." सुरज उगते ही ... पुजा तुलसी की होती है। ... सूरज ढलते ही पुजा तुलसी होती है। ... बच्चे इर्द-गिर्द हमेशा खेलते है उसके । ... किसीको चोट लगे तो तुलसी  मदत करसकती है । ... में तो आमिर हु बस पर अकेला भी काफी हु ... क्या तुम मेरे साथ अपनी बची कुची जिंदगी गुजरना चाहोगी ? " ... तारीफ कर कैक्टस ने उसे प्रोपोज़ कर दिया ...
तुलसी भी 'हा' केहे बैठी ... जिस जमी पर उसे भगवान समझकर दिनरात  पुजा जाता था ... उसे छोड़कर ... भद्दासा , अलसी , नुकीला पर ...  हराभरे  कैक्टस से  उसे भी प्यार हो गया था  ... क्युकी  एक प्यार में अंधी पगली ही ... उस काटोवाले के साथ दिल लगा सकती है !  
 पर वो भी काफी प्यारा था ... अपनी लचीली टहनियों से क्या क्या चीजे उसपे फेंककर प्यार जता था ... और तुलसी तो क्या कहने ... पहेली ही दुबली पतली सी थी ... पर त्योहारों के अनुसार व्रत रखा करती थी कैक्टस के लिए !
हर शाम जब दिया लगता था तुलसी के सामने , तब  कैक्टस तो बेहद खुश होता था  उस खुबसुरती को देखकर !

घर वालो की नजर में तो ये इश्क आया नहीं ...नहीतो आमिर-गरीब , जात-भेद से रिश्ता बनता नहीं ...   पर जिस दोपहर भरी बारिश पड़ी थी ... तुलसी ने पहेली बार ... इंद्रधनुष्य देखा था ... बारिश में भीगी , ठंडी हवाओंसे परेशां  ... काफी नजाकत के साथ जरासी झुक कर हसी थी वो... जैसे कोई लड़की बाल सुखा  रही हो ! शाम होते ही ...  काले बालों सा काला अँधेरा छा गया ... मोहल्ले में बत्ती नहीं लगी उस रात  ... बस एक बिजली सामने ही आकर गिरी थी जब कैक्टस की आँख खुली ... सुबह होनेपर समझा ... वो तुलसी भी जल कर राख हो गई  थी  ... उस बिजली का  कैक्टस पर गिरने का  पहला हक़ तुलसी ने कैकटस से छीन लिया था !

Friday, 15 April 2016

लेखक

लेखक 

लेखक म्हणजे … एक कोळी (स्पायडर) असतो . प्रत्येकाचा घरात तो असतो … कधी कधी सर्वां समोर बिंधास्त वावरतो नाहीतर कोणत्या तरी कोपऱ्यात लपुन-छपून … स्वताची कलाकारी निर्माण करत असतो . 

कोळ्याला आठ पाय असतात आणि लेखकाला  एकाच गोष्टी कडे किमान आठ वेग-वेगळ्या दृष्टी ने पहायचं कौशल्य असतं . कोळ्याच्या तोंडातून काही चिकट द्रव्य निघतात … तसच लेखाच्या लेखणीतून शाईच्या रुपाने… त्याचे विचार कागदाला चिकटतात , शब्दांची गुंतागुंत साधुन तोही आपलं जाळं निर्माण करतो . 

कधी सूर्याच्या तिरक्या प्रकाशात कोळ्याच जाळं पाहिलंय ? … खुपच मोहक मोत्यांनी विणल्या सारखं  दिसुन येतं ! तसच लेखकाला लिहिण्यासाठी  प्रकाश आणि प्रकाषक दोघं  लागतात , मग त्याच्या कलमाच्या निळ्या किंवा काळ्या शाई चा रंग सोनेरी अक्षरात बदलुन अजरामर होऊ शकतो . 

कोळी आणि लेखक (सगळेच नाही) … बऱ्याचदा … शांत , सय्यमि ,एकलकोंडे , किळसवाने … वाटत . पण एकदा का तुम्ही त्यांच्या जाळ्यात  अडकलात … की तुम्हाला त्यातुन सुटका नसते , त्यांच्या कडे सगळे खेचले जतात .

आईला जसा रोज काय भाजी बनवावी ? असा प्रश्न पडतो … तसाच आज काय लिहावं ? असा प्रश्न  लेखकाला ही पडतो… आई स्वता शरीराने बाजारात जाते, लेखक मात्र मनाने … कुठेही जाऊन विषयाचा बाजारहाट करून येतो, कधी कधी पाऊस पडत असतो… तेव्हा मनही आळशी बनत, तेव्हा भिंती वरचा कोळी देखील … लेखकाच्या विषयाची पोळी होऊन जातो !


Friday, 8 April 2016

Bioscope

Friend'ship'                                                

Life is a ship
and friends are sailors 
priceless is this trip 
when all are together 

wave create hurdles
on the way 
we make huddle 
& throw them away 

salty water of ocean 
we friends never cared 
but salty tear of a dear 
due to some fear 
we cuddle up again 
at end at the shore
we are sure what is soar 
that,
those were sweet memories 
when 
life was a ship 
friends were sailors
priceless was that trip 
when all were together !

Dedicated to Harsha Mahajan for Almost 
5 years of Friend'ship' ! 


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 असते विचित्र 
उन्हाळ्यातली रात्र

असते विचित्र 
ती उन्हाळ्यातली रात्र 
येते उशिरा 
आणि जाते लवकर 
घरा मध्ये  झोपत नाही 
कोणी ,
सगळे गच्यांवर 
चाले तिथे डाव खेळांचा         
संपूर्ण सुट्टीभर 
मामाच्या गावावर 
चांदण्या भरपूर 
त्यात चंद्र झोपलेला 
एकटाच ढाराढूर 
दिवसभराच्या गरम हवे चा 
रात्री कसा होतो गार वारा 
दिवस देतो चटके 
आणि रात्र मारे फुंकर त्यावर
हा तर निसर्गाचा जिव्हाळा

 अशी असते विचित्र 
उन्हाळ्यातली रात्र 

Subject By Taanvi Chikhlikar ... Most Balish Friend of mine ! 

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उम्मीदों को सलाम 

उम्मीद और स्वीकार 
के बिच जो है वो 
जिंदगी , एक जुगाड़ है 
जिसमे जितना कुछ और 
पर जीता कुछ और जाता है 
उम्मीदों को सलाम। 

उम्मीद और स्वीकार 
के बिच जो है वो 
जिंदगी , जैसे कोई तोहफा है 
जिसमे चाहिए कुछ और 
पर मिलता कुछ और है 
... उम्मीदों को सलाम। 

मन चाहा मिल जाये 
तो उम्मीद ये अमर है यारो 
मन चाहा न मिल पाए 
तो उम्मीद भटकती आत्मा है यारो 
... उम्मीदों को सलाम 
हर उस मरे ,
या शहीद हुई उम्मीद को सलाम 
जो खुद मर कर ,
रखे इंसानो को जिन्दा 
जिसपे दुनिया कायम है 
उन उम्मीदों  को सलाम 
उन उम्मीदों को सलाम ! 

For Kalyani Rajhans ... !

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i settle on shirts 
i climb on trousers 
i creat foot steps
on a clean floors 
but i get washed away 

water is my mother
dirt is my father
pigs are my best friends
farmers are my owner
potter is my teacher
but no lover

children play 
with me as clay
and
as their mind say 
They  shape me anyway 

Hello i am mud 
slipery and absurd
once i was sand
it rained on land
now ,i turned as mud ! 

 subject from most Crazy person ever 
Aishwarya Thade
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Blogger not supporting further so stopping here ... 
Happy reading !













Saturday, 2 April 2016

Travelling on a paper

"World is like a paper ... and to 'write' on it ... is like travelling !"

If travelling is exploring world then writing is exploring world within you .
Ups and downs in life are like mountains and valleys on Earth , happiness is like river , with all twists and turns but sorrow is like sea , all rivers finally meet at it ! 

Being in bird ( Aeroplane ) , being in fish ( ships ) , being in snake ( rail ) being on wheels ( road ) being on feet ( walk ) ... if you are traveller or just change colour of a ink or paper ... if you are writer ... explore world by anyway ... be with family ... or discover new friends ... at end of a trip or end of page ... you will always find new you not anyone else ! 

Thousands of people all strangers in new city and everything unknown ... will make you find something of yourself !
thousands of words all like strangers on a new page and everything blank will make you find something for yourself ! 

It's always finding yourself ... though no matter you are in you small room or in front of huge Everest ... It's always finding Yourself ! Before exploring world ... explore your mind ... then it wil be much easy to Tarvel !

"World is like a paper ... and to 'write' on it ... is like travelling !"

गंध

प्रत्येकाच्या काही आवडी निवडी असतात, त्या आवडी निवडींना कोणताच पर्याय उरत नाही तेव्हा ते 'हट्ट' होऊन बसतात. जी गोष्ट माणसाला एकत्र आ...