तीसरी मंजिल पर रहनेवाले अमीरों के केक्टस (cactus) को सामनेवाली झोपड़ी के बाहर रेहने वाली तुलसी से प्यार हो गया था।
खिड़की में बसा कैक्टस झुकी नजरो से उसे दिन रात ताड़ता था। ... नन्हीसी मुस्कान देकर... उससे बात करना चाहता था। तुलसी भी सूरज , बादल , चाँद को ... देखने के बहानेसे तिरछी नजरो से अंगड़ाई देते वक्त कैक्टस को देख लेती थी ... शरमाकर मुंह फेर लेती थी। ... क्युकी वो हर वक्त उसे ही देखता था।
सुरज की पहेली किरण , बारिश की पहेली बून्द , खुली साफ़ हवाए , शहर की बदलती तस्वीरो ... पर जैसे कैक्टस का अधिकार था ... ऐसे तुलसी सोचती थी ... क्युकी वो आमिर था।
कैक्टस का मानना था ..." सुरज उगते ही ... पुजा तुलसी की होती है। ... सूरज ढलते ही पुजा तुलसी होती है। ... बच्चे इर्द-गिर्द हमेशा खेलते है उसके । ... किसीको चोट लगे तो तुलसी मदत करसकती है । ... में तो आमिर हु बस पर अकेला भी काफी हु ... क्या तुम मेरे साथ अपनी बची कुची जिंदगी गुजरना चाहोगी ? " ... तारीफ कर कैक्टस ने उसे प्रोपोज़ कर दिया ...
तुलसी भी 'हा' केहे बैठी ... जिस जमी पर उसे भगवान समझकर दिनरात पुजा जाता था ... उसे छोड़कर ... भद्दासा , अलसी , नुकीला पर ... हराभरे कैक्टस से उसे भी प्यार हो गया था ... क्युकी एक प्यार में अंधी पगली ही ... उस काटोवाले के साथ दिल लगा सकती है !
पर वो भी काफी प्यारा था ... अपनी लचीली टहनियों से क्या क्या चीजे उसपे फेंककर प्यार जता था ... और तुलसी तो क्या कहने ... पहेली ही दुबली पतली सी थी ... पर त्योहारों के अनुसार व्रत रखा करती थी कैक्टस के लिए !
हर शाम जब दिया लगता था तुलसी के सामने , तब कैक्टस तो बेहद खुश होता था उस खुबसुरती को देखकर !
घर वालो की नजर में तो ये इश्क आया नहीं ...नहीतो आमिर-गरीब , जात-भेद से रिश्ता बनता नहीं ... पर जिस दोपहर भरी बारिश पड़ी थी ... तुलसी ने पहेली बार ... इंद्रधनुष्य देखा था ... बारिश में भीगी , ठंडी हवाओंसे परेशां ... काफी नजाकत के साथ जरासी झुक कर हसी थी वो... जैसे कोई लड़की बाल सुखा रही हो ! शाम होते ही ... काले बालों सा काला अँधेरा छा गया ... मोहल्ले में बत्ती नहीं लगी उस रात ... बस एक बिजली सामने ही आकर गिरी थी जब कैक्टस की आँख खुली ... सुबह होनेपर समझा ... वो तुलसी भी जल कर राख हो गई थी ... उस बिजली का कैक्टस पर गिरने का पहला हक़ तुलसी ने कैकटस से छीन लिया था !
खिड़की में बसा कैक्टस झुकी नजरो से उसे दिन रात ताड़ता था। ... नन्हीसी मुस्कान देकर... उससे बात करना चाहता था। तुलसी भी सूरज , बादल , चाँद को ... देखने के बहानेसे तिरछी नजरो से अंगड़ाई देते वक्त कैक्टस को देख लेती थी ... शरमाकर मुंह फेर लेती थी। ... क्युकी वो हर वक्त उसे ही देखता था।
सुरज की पहेली किरण , बारिश की पहेली बून्द , खुली साफ़ हवाए , शहर की बदलती तस्वीरो ... पर जैसे कैक्टस का अधिकार था ... ऐसे तुलसी सोचती थी ... क्युकी वो आमिर था।
कैक्टस का मानना था ..." सुरज उगते ही ... पुजा तुलसी की होती है। ... सूरज ढलते ही पुजा तुलसी होती है। ... बच्चे इर्द-गिर्द हमेशा खेलते है उसके । ... किसीको चोट लगे तो तुलसी मदत करसकती है । ... में तो आमिर हु बस पर अकेला भी काफी हु ... क्या तुम मेरे साथ अपनी बची कुची जिंदगी गुजरना चाहोगी ? " ... तारीफ कर कैक्टस ने उसे प्रोपोज़ कर दिया ...
तुलसी भी 'हा' केहे बैठी ... जिस जमी पर उसे भगवान समझकर दिनरात पुजा जाता था ... उसे छोड़कर ... भद्दासा , अलसी , नुकीला पर ... हराभरे कैक्टस से उसे भी प्यार हो गया था ... क्युकी एक प्यार में अंधी पगली ही ... उस काटोवाले के साथ दिल लगा सकती है !
पर वो भी काफी प्यारा था ... अपनी लचीली टहनियों से क्या क्या चीजे उसपे फेंककर प्यार जता था ... और तुलसी तो क्या कहने ... पहेली ही दुबली पतली सी थी ... पर त्योहारों के अनुसार व्रत रखा करती थी कैक्टस के लिए !
हर शाम जब दिया लगता था तुलसी के सामने , तब कैक्टस तो बेहद खुश होता था उस खुबसुरती को देखकर !
घर वालो की नजर में तो ये इश्क आया नहीं ...नहीतो आमिर-गरीब , जात-भेद से रिश्ता बनता नहीं ... पर जिस दोपहर भरी बारिश पड़ी थी ... तुलसी ने पहेली बार ... इंद्रधनुष्य देखा था ... बारिश में भीगी , ठंडी हवाओंसे परेशां ... काफी नजाकत के साथ जरासी झुक कर हसी थी वो... जैसे कोई लड़की बाल सुखा रही हो ! शाम होते ही ... काले बालों सा काला अँधेरा छा गया ... मोहल्ले में बत्ती नहीं लगी उस रात ... बस एक बिजली सामने ही आकर गिरी थी जब कैक्टस की आँख खुली ... सुबह होनेपर समझा ... वो तुलसी भी जल कर राख हो गई थी ... उस बिजली का कैक्टस पर गिरने का पहला हक़ तुलसी ने कैकटस से छीन लिया था !
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