बाहर की गर्मी घर में घुसपेठ कर रही थी।
दोपहर का समय था, गली जैसे सुस्थ थी।
घरों की दीवारें मुझे काफ़ी लुभाती है। डिग्रियाँ, चित्रकलाए, मरे हुए लोगों की तस्वीरें, भगवान और महात्माओं की तस्वीरें, इन इतनीसारी असंबंध चीज़ों की फ़्रेमो को एकसाथ एकही दीवार लटकता देख अलगसा अहसास होता है।
किसी दुकान में आया हूँ जैसे, पर कुछ ख़रीद नहीं सकता।
घर में बस एक बूढ़ा रहता है, एक हादसा हुआ और बाक़ी तो सब तस्वीरों में जाकर बस गये। घर की काफ़ी चीज़ों की उम्र बूढ़े बाबा के आसपास ही है। हमेशा एक अच्छी चलने लगती है तो दूसरी परेशान करने लगती है। घरवालों की याद आती है तो रिश्तेदार या दोस्त आता है बूढ़े की मरम्मद करने। मशीन अगर तकलीफ़ दे तो बाबूलाल को ये बूढ़ा बुला लाता है।
इस बार घर में फ्रिज ने 'काम बंद आंदोलन' छेड़ा है। घर में कम सिखा हुआ बाबूलाल फ्रिज ठीक कर रहा है और बूढ़ा वही पर किचेन में बैठकर बकेती कर रहा है।
-मेरे देश और मेरे फ़्रीज़ में जैसे मुक़ाबला छिड़ा है के कौन ज़्यादा बार बंद पड़ेगा।
-तो बापसाहब आगे कौन है?
-आगे तो मेरा देश है, इस साल मेरे फ्रिज, टिवी और स्कूटर के आगे निकल गया है।
-बेच क्यूँ नहीं देते? ये चीज़ें अब पुरानी हो चुकी है।
-पुराना और बूढ़ा तो में भी हो गया हूँ बे...
-आपको कोई नहीं ख़रीदेगा जी...
-भोसडिके अपना काम कर...
-बापसाहब देखो गाली देने का काम नहीं, अभी कामगारों के नेताओ को बुलाकर आपको लटका दूँगा।
-हाँ भाई क्यूँ नहीं, ककड़ी खाएगा? क्या ये भी उन्हें पुछकर करता है?... साला यहाँ यही तो मांजरा है जो जितना ज़्यादा सिखा हुआ होता है वो उतना ही शांत होकर सहता रहता है... नमक ले।
-हाँ, पर चलो सॉरी और ककड़ी के लिए थैंक यूँ।
-हाँ अब तुम मेरे दोस्त तो नहीं, तो ये कह सकते हो।
-आप कितने सिखे हो?
-काफ़ी, बोहोत ज़्यादा सह सकता हूँ इतना पढ़ा लिखा हूँ। इलेक्ट्रिशियनही बन जाता तो अच्छा होता...
-बापसाहब आप हो पैसे वाले बाबू, तो तुम्हें ग़रीब होने की चाह है, हम जैसे ग़रीबों का निवाला हाथों से छिन लिया जाता है तो एक पल कुछ भी सेहनेकी फ़ितरत नहीं रहती।
-और ककड़ी चाहिए?
-नहीं, आप फ्रिज में क्या जलता कोयला रखते हो? पूरा जल गया है कंप्रेसर...
-बस ककड़ी जैसी सब्ज़ियाँ रखता हूँ...
-ठीक है ठीक है।
-यार बाबूलाल तुम कोई नक़ाब नहीं पहनते, अच्छा लगता है।
-ऐसा है के में ग़रीब हूँ बेरोज़गार नहीं इसलिए हर वक़्त फटा हुआही हूँ। या तो फिर नक़ाब कब का उतर गया होगा नहीं तो वो नक़ाब ही मेरा चहरा है।
फ़्रीज़ तो चलो दुरुस्त हो गया। काम होते ही तोलमोल हुआ और एक ग़रीब अपना स्वाभिमान लेकर चला गया और एक अमीर अपनी तोंद जैसी अक़्ल को लेकर बंद-चालु-बंद होता हुए देश में सहता रहा।
मेरे, तुम्हारे, हम सबके घरका फ्रिज इस साल अपने देश से कमबार बंद हुआ होगा। ज़ाहिर है दर्द, तकलीफ़, नुक़सान सभी को हुआ है... अपना देश सच में एक फ्रिज है, फ़्रीज़र माने कश्मीर बेहद ठंडा, सबसे नीचे कन्याकुमारी काफ़ी गरम, ड़ाए और बायें गुज़रात और कोलकाता जिनके सिवा दिन नहीं गुजर सकेगा... बस ये धर्म, राजकारन और बेरोज़गारी का कोयला, आग और रोटी बनकर ये फ़्रीज़ तबाह हो रहा है।
कैसे था के पहले हाथ, पाव, सिर दुखा करता था मलम लगातेही सुकून मिलता था... अब भावनाएँ दुखा करती है और दवा ही नहीं हैइसपर। Thank you और sorry की गुंजाईश है ही नहीं, मगर, क्या हम दोस्त है? वैसे तो देश हमारा फ्रिज है मगर oven सा झुलस रहा है अंदरही अंदर।
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