अगर शराब पिने वाले को शराबी कहते है... तो किताबो को पढ़ने वाले पागल को 'किताबी' क्यों नहीं?
किताबियतजब घर पर पढ़ने खातिर
किताब न हो...
तो लगता है जैसे आखिर
माँ घर पर आयी नहीं...
फिर अनजान चीजों को ढूंढ़कर
बेमंज़िल टहलकर
फिर पढ़ लेता हु....
बासी ठंडा अखबार सुबह जो थी जल्दी बड़ी...
पढ़कर अखबार लगता है जैसे
खा लिए नूडल्स मैदे के
पर पेट अभीभी भरा नहीं
पुरानी जो किताबे
अब जिनमे मुझे दिलचस्पी रही नहीं
नहीं बची है कहानी उनमे
लगती है जैसे खाली
बोतलें है शराबकी
अब पढ़ने की प्यास कहो
या कहो भूक शब्दों की... या ये है लत मेरी।
जल्द थमा दो किताबे हाथो में मेरे
नहीं तो मुझसे कोई बुरा नहीं
चढ़ गयी है रात अब
मदिरालय है भरे हुए...
ग्रंथालयो में लगा है ताला
... पापा की लायब्ररी से
चुराली एक किताब मैंने
पढ़लिया मैना अफ़साना
अब शांत लग रहा है...
माँ की आहट आ रही सुनाई
अब रख देता हूँ किताब
जहाँ से थी उठाई
किसी अपनों या दुश्मनो को भी
ये लत ना लगे कभी ...
की कोई उसे कहे... ए किताबी... ए किताबी!
- दुर्गेश
Mast bhai....#kitabi
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